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Showing posts from December, 2017

प्रेम

ना जाने क्यों? लोग इस शब्द अथवा इसकी अनुभूति को लेकर इतने चिंतित या उलझे हुए रहते हैं। यह तो श्वेत, सरल, सादा, लेकिन उच्चतम है। जिसे हम 'प्रेम' नाम से जानते है। जो शायद सबकी समझ म...

किनारे का पत्थर

माना कि शाम उस किनारे पर बड़ी ही मनोहारी होती है।पर उस सुबह वहां की हवा में कुछ अलग ही बात थी । वो किनारे पर बनी हुई कंक्रीट की सीमा जिस पर सूर्य की किरणे बड़ी बड़ी इमारतों के बीच में  होकर आती हो,मानो जैसे किसी आम के बाग में धूप, पत्तो के बीच से आती हो। हालंकि इस प्रकाश में वो शीतलता तो नहीं थी ,फिर भी सुबह ७:३० की धूप और इमारतों की मौजूदगी मौसम को ठंडक प्रदान कर रही थी । शायद ...शायद मौसम उस समय का भी हर दिन की तरह साधारण ही था ।शायद वह धूप भी उतनी ही तेज थी जितनी रोज होती थी। पर उसके इस अद्भुत सौन्दर्य का कारण किसी शख्स की मौजूदगी थी । वो जो मुस्कुराती तो कलियां शर्मा जाती ,वो जो एक नजर उठाती तो प्रकाश बिखर जाता ,जिसकी खुशबू किसी कस्तूरी से कम न थी ।माना कि कोई इतना खूबसूरत भी नहीं हो सकता, पर मेरी नज़र तो हमेशा उसे इसी तरह देखती थी। आज सुबह ही हम दोनों साथ समुन्द्र किनारे घूमने आए थे या यूं कहा हा सकता है, मैं आज अपने दिल की बात करने यहां आया था ।यह बताना चाहता उसे की वो कितनी जरूरी है मेरे जिंदगी में ,किस तरह सिर्फ उसकी जगह है मेरे दिल में,बस एक उसके पाने से मै कितना संतुष...