प्रेम

ना जाने क्यों? लोग इस शब्द अथवा इसकी अनुभूति को लेकर इतने चिंतित या उलझे हुए रहते हैं। यह तो श्वेत, सरल, सादा, लेकिन उच्चतम है। जिसे हम 'प्रेम' नाम से जानते है। जो शायद सबकी समझ मे नही आता, लेकिन अनुभव मे तो आ ही सकता है या यूँ कहा जा सकता है कि आ ही जाता है।क्योकि प्रेम तो एक क्षणिक अनुभव का नाम है, पल भर मे एक जीवन की परिभाषा है। परंतु ये भी छुपा नहीं है, कि व्याख्या करने और समझने में यह अनंत है।सच तो यह है कि सोचने की कोशिश मे ही ये आपको अपनी आगोश मे कुछ इस तरह ले लेता है कि हम इसमे ही खो जाते है।
Jesus crist ने तो प्रेम को परमेश्वर कहा है। तुलसीदास के अनुसार भी राम ही परम सत्य हैं और उन्हे पाने का एकमात्र साधन प्रेम ही है। यदि मुझसे पूछा जाए तो ईश्वर और प्रेम एक ही हैं। दोनों के लगभग सभी गुण एक जैसे ही हैं। दोनों एक अनुभूति मात्र हैं और विश्वास पर निर्भर है। अगर गौर किया जाए तो हर एक के जीवन मे वह क्षण अवश्य आता है, जब उसे प्रेम या ईश्‍वर की अनुभूति हो।
असल मे आज प्रेम की परिभाषा उतनी पवित्र नहीं रही। प्रेम सुनते ही मन कई प्रकार के घृणित दृश्यों की कल्पना मे लग जाता है। इसका कारण मुख्यतः लोगो की मानसिकता है।एक तो वो लोग जो प्रेम को केवल दैहिक समझते हैं और दूसरे वो जो सिर्फ क्षणिक संतुष्टि के बाद रिश्ते तोड़कर प्रेम को बदनाम करते हैं। जबकि प्रेम तो समय के साथ प्रवाह की तरह बढ़ते जाता है।
प्रेम और विरह दोनों एक दूसरे के परस्पर पूरक हैं। किसीकी कमी ही मनुष्य को उस व्यक्ति के महत्व को समझाने मे मदद करती है। प्रेमी के वियोग मे बिताए गए प्रत्येक क्षण में, बहाए गए प्रत्येक आंसू मे प्रेम की एक व्यापक गाथा छिपी होती है। अतः प्रेम सीमाओं, दूरियों और भ्रांतियो से कुंठित नहीं होता, अपितु अत्यधिक बढ़ता जाता है।असल मे वियोग और अश्रु ही प्रेमी के जीवन की श्वास धारा होती है।
नारदभक्ति के अनुसार प्रेम कामनारहित, गुणरहित और निरंतर वर्धमान होता है। यद्यपि प्रेम को किसी सीमा मे बांधना अन्याय होगा। परंतु प्रेम का विश्लेषण अवश्य ही किया जा सकता है। प्रेम को समझने का सबसे ठीक और आसान तरीका यही है कि प्रेम किया जाए।

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