सत्यमेव जयते


सत्य एक ऐसा विषय है, जो अस्तित्व के परे है। यानि जब संसार मे कुछ ना होगा तब भी सत्य होगा। सत्य ना तो कभी बदलता है और ना कभी मिटाया जा सकता है।
लेकिन सत्य सबके लिए एक जैसा नहीं होता। हो सकता है जो बातें आपके लिए सच प्रतीत होती है, वह किसी और के दृष्टिकोण से गलत हो। सत्य की एक और विवेचना ये हो सकती है कि हम सभी सत्य को कभी प्राप्त ही नहीं कर सकते। असल मे हम सब यात्रा करते है, एक निम्न सत्य से उच्च सत्य की ओर। ऐसे मे किसी भी कथन का पूर्णतः सत्य अथवा असत्य होना, परिस्थितियों पर निर्भर है।
अब जैसा कि गांधीजी ने कहा था कि सत्य मे असीम शक्ति है। सत्य के मार्ग पर चलने पर हमे और  किसी व्रत का पालन करने की आवश्यकता नहीं है। यूं भी कहा जा सकता है कि परमात्मा और सत्य एक ही है। केवल वही है जो सत्य है और सत्य यही है कि केवल वही है। परमेश्वर और सत्य दोनों ही अमर हैं।
अब यह सोचना आता है कि विवादों के वक़्त दोनों ही पक्षों के मत सत्य ही लगते हैं, परंतु अर्ध सत्य झूठ से भी कई ज्यादा खतरनाक होता है। असल मे सत्य एक परिपूर्ण परिभाषा है। अतः अर्ध सत्य भी झूठ ही होता है।
जितना आवश्यक सत्य कथन है, उतना ही आवश्यक है सत्य को स्वीकार करने की हिम्मत रखना। सत्य हमे अपने आपको टटोलने, अपनी गलतियों को सुधारने का मौका देता है। इसके लिए आवश्यक है कि हम स्वयं से सत्य बोले और बेवजह की तारीफ के आदी ना हो जाए।
सत्य एक व्रत है।जिसका पालन करने से हमे धीमी , कठिन, परन्तु टिकाऊ प्रगति प्राप्त होती है। आखिर सच ही कहा गया है 'सत्यमेव जयते'।
अंत मे सत्य के बारे मे यह कहा जा सकता है....
'ये जमीं जब न थी, ये जहाँ जब न था,
चाँद, सूरज न थे, आसमाँ जब न था,
राज़ - ए - हक़ भी किसी पर बयां जब न था,
तब न था कुछ यहाँ था मगर तू ही तू।'

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