आज़ादी
समझ नहीं आता शुरुआत कहा से की जानी चाहिए। खैर कभी ना कभी, किसी ना किसी तरह यह बात मुझे लिखनी ही थी, तो क्यों ना तुम्हारे माध्यम से ही इसे दुनिया से साझा किया जाए। मुझे पता नहीं तुम तक ये लेख पहुंचेगा भी या नहीं, पर मुझे पता है तुम्हें थोड़ा अजीब तो अवश्य लगेगा इसे देखते ही।
ख़ैर नाम लेने की कोई खास जरूरत तो नहीं लगती मुझे, तो मै तुम्हारे बारे मे जो बताऊंगा वो मेरी इसी कहानी मे शामिल होगा और शायद उतना काफी है, तुम्हारे मनोहारी व्यक्तित्व को चित्रित करने के लिए।
अक्सर हम सभी को चीज़े बीत जाने के बाद उनका मूल्य पता चलता है। कुछ ऐसा ही प्रेम के मामले मे होता है। कह नहीं सकता प्रेम था तुमसे, पर ये कहा जा सकता है कि मैंने ये जरूर सोचा था प्रेम हो सकता है तुमसे। वैसे तो हमारी बातें नहीं हुई जब तक हम साथ थे, तो हमारा दोस्त होना भी मुमकिन नहीं था।
याद है, वो वक़्त पर जब हमारी मुलाकात हुई या यूं कहो पहली दफा जब सिर्फ तुम मुझसे मिलने आयी और मै तुमसे। एक दूसरे की बातें कितनी मिलती थी। तुम और मै दोनों ही नहीं चाहते थे कि हम किसी को खो दे, दोनों ही को लोग बातों से पसंद आते थे। हाँ, तुम्हारे गाने का स्वाद मुझसे कुछ अलग था।खैर आजकल वैसे भी लोगों को कव्वाली कहाँ पसंद आती है।
पहली ही मुलाकात मे हम दोस्त या यूं कहे एक दूसरे के हो गए थे।हाँ, तुम कहती थी कि हम अभी इतने करीबी नहीं है, पर वो कहते है ना आने वाली बातों का अंदेशा हो ही जाता है।
हम एक दूसरे को जानने लगे थे, शायद हाँ और शायद नहीं भी। मै जितना भी तुम्हें जानता था तुम स्वच्छंद थी अपने विचारों मे। याद है अब भी वो बात, 'मेरे किराए मै ही दूँगी आपको देने की जरूरत नहीं।'
फिर एक मोड़ आया हमारी इस दोस्ती मे, जाहिर सी बात है इज़हार कितने दिन दबा रह सकती है। किसी ने सच ही कहा है, 'जो एक बार मन मे आ जाता है, वह होकर ही रहता है।' मैंने तुम्हें अपने मन की बात तो कह दी और यकीन भी था तुम्हें भी मुझसे प्यार है। पर.... पर शायद अभी भी मै तुम्हें नहीं समझ सका था, आखिर इंकार का कारण ढूंढना ही मेरा मकसद बन गया। जैसा कि मै कह चुका हूँ, मुझे अब भी लगता था तुम्हें मोहब्बत है पर इंकार की वजह कुछ और है।
आखिर एक रोज तुमसे किसी तरह मैंने ये कहला ही लिया कि तुम्हें भी प्यार है मुझसे, फिर वो क्या चीज़ थी, जो तुम्हें रोके हुई थी, ये ख्याल भी मुझे बेचैन किए हुए था। फिर एक रोज साफ हुआ कमी का
'तुम्हारे पास क्या नहीं था।तुम भी बेहद तेज, चतुर, स्वाभाव से अच्छी थी । सब कुछ तो एक जैसा था हमारे बीच। क्या सिर्फ लड़का और लड़की होना इतना सोच बदल देता है?
पर धीरे धीरे पता चला
सपने तुम्हारे भी थे, तुम्हें भी मन होता था शाम की सैर का,तुम भी तड़पती थी बाहों के घेरो के लिए, तुम भी मुझसी ही थी, बिल्कुल मुझसी।
फिर आज ऐसी कौनसी चीज़ है जो तुम्हें बाँधी हुई है, ना जाने किन बन्धनो ने जकड़ा है तुम्हें।समाज... क्या समाज से लड नहीं सकते, क्या इन फिज़ुल के उसूलों से प्यार को छोड़ देना बंद नहीं हो सकता।
आज... आज समझ आ चुका है मुझे और सच बताऊँ तो मै भी आज तुम सा ही महसूस कर रहा हूँ।मेरी बड़ी बड़ी बातें सब धूल रह गयी। बस एक खयाल रहता है मन मे तुम्हें पाने के लिए सबसे तो लड़ा जा सकता है, पर मैं तुमसे कैसे जीतूंगा, कैसे हरा सकूंगा तुम्हारे बन्धनो को,कैसे समझाऊँगा खुदको की प्यार सही है, जमाना गलत। कैसे खुदसे आँख मिलाउंगा। कैसे कहूंगा अपने दोस्तों से मै सिर्फ लिखता नहीं, मैंने प्यार किया था और उसके लिए हर कोशिश की।
आज मै भी तुमसा हो गया हूँ, लाचार, बेदार, बिना सपनों वाला गरीब, नाउम्मीद। आखिर मैंने भी खो दी है अपनी 'आज़ादी'...
Comments
Post a Comment