शांति-एक तपस्या

आजकल के इस तेज भागते से शोरगुल भरे जीवन मे यदि कोई वस्तु सबसे ज्यादा खोजी जाती है तो वह है शांति। लोग बगीचों, मैदानों, पहाड़ों वगैरह जगहों पर सिर्फ खुदको दुनिया से दूर करने के लिए ले जाते रहे हैं।
लेकिन क्या सचमुच कुछ लोगों से दूर हो जाना ही शांति प्राप्त करने के लिए आवश्यक है। शायद नहीं, शांति तो मन की एक विशिष्ट अवस्था का नाम है, अर्थात हो सकता है कि आप दुनिया से दूर होकर भी बहुत बेचैन रहे और ये भी हो सकता है कि आप दुनिया के साथ होकर भी शांत रहे।
अतः अब यह सवाल आता है, जबकि शांति का सीधा संबंध हमारे मन से है तो इसे प्राप्त कैसे किया जाए। कोई तो तरीका होता होगा चित की शांति का। वैसे तो कई तरह के योगासन हैं, जिनसे की हम अपने शरीर को शांत कर सकते हैं, परंतु मन की शांति के लिए आवश्यक है कि हम अपने सोच को नियंत्रित कर सके।
असल मे शांति से यहाँ आशय उस अवस्था से है, जिसमे आप सारे संसार से दूर एक ऐसी अवस्था मे पहुंच जाते हैं, जहाँ आप खुद से बातें कर सकते हैं। जहाँ आप स्वयं का साक्षात्कार करते हैं, और अपने आप का अवलोकन कर पाते हैं। यही वह शांति होती है शायद जिसे आप वर्षो से तलाश रहे हैं।
हमारे साहित्य के रसों में भी शांतरस का समावेश है। बल्कि यह कहना अनुचित नहीं होगा कि शांति है सबसे आवश्यक रस है। शांति से ही हम अपने भीतर के अन्य रसों के बारे मे जान सकते हैं।
शांति मे भी एक विशेष आवाज होती है, जो स्वयं से परिचय का एक उत्तम साधन है। इसके अतिरिक्त हम खुदको जान लेने के बाद अपने सही गलत अनुमान लगा पाते हैं, अतः हमारे सारे निर्णय हमारी प्रगति के लिए प्रेरक होते हैं।
तो चलिए एक प्रयास करते हैं, शांत होकर खुद की खोज मे कही खो जाने का। 

Comments

Popular posts from this blog

सत्यमेव जयते

हाथ

आज़ादी